शायद आज जो आक्षेप मैं इस हिन्दी ब्लोगजगत पर लगा रहा हूँ हो सकता है की वो बहुतों को विचलित कर दे पर क्षमा चाहता हूँ । वैसे तो इस विषय पर लिखना नहीं चाहता था पर अपने मन मस्तिष्क रूपी कुरुक्षेत्र मे उपजे विचारों ने मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया। वैसे शीर्षक में मैंने जिन शब्दों का प्रयोग किया है आज हमारी या यूँ कहें की हम सभी की स्थिति अमूनन वैसी ही है। आज हम सिर्फ दौड़ रहें हैं पर क्यूँ ? आखिर हम इस अंधी दौड़ का हिस्सा क्यों बने पड़े हैं। इसका उत्तर जानने की मैंने बहुत कोशिश की पर किसी से संतोषप्रद उत्तर न पा सका।
जहाँ तक मैं निर्बुद्धि समझ पाया की वास्तव में इस हिन्दी ब्लोगजगत का हर सदस्य एक राजनैतिक उद्देश्य के साथ यहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। हो सकता है आप कहें की क्या कविता, साहित्य, व्यंग, निजी जीवन के अनुभव और धर्म आधारित रचनाएँ आदि भी क्या राजनैतिक स्वार्थ से प्रेरित हो सकती है। वस्तुतः जहाँ तक मैं समझता हूँ राजनीति एक ऐसी विषय वस्तु है जिससे कोई मनुष्य परे नहीं रह सकता। या यूँ कहें राजनीति मनुष्य का प्राकृतिक गुण है जो हमारे बुद्धि और विवेक के साथ हमारे रगों में बहता है। तभी हम अपने से कम क्षमतावान पर शासन कर पाते हैं फिर चाहे वो पशु हो या मनुष्य।
फिर ये ब्लोगजगत भी तो मनुष्यों का समूह है तो फिर ये मनुष्य के राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने योग्य भूमि तो उपलब्ध तो करती ही है।